39. गोपीनाथ बार्दोलोई- भारतरत्न 1999
(जन्म- ६ जून १८९०,निधन १९५०)
भारत के स्वतंत्रता सेनानी और असम के प्रथम मुख्यमंत्री थे।
“कोई भी व्यक्ति सही अर्थों में लोकप्रिय तब होता है, जब वह लोगों के सुख-दुख का भागीदार बनता है, उनके बीच रहता है और उनके हित के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करता है। गोपीनाथ बार्दोलोई को मैं एक ऐसा ही राजनेता मानता हूं, जिन्होंने जीवन-भर असम के आम लोगों के हित के लिए काम किया और निःस्वार्थ भाव से किया।” — डॉ. शंकरदयाल शर्मा|
गोपीनाथ बार्दोलोई का जन्म 1890 में असम के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। सन् 1907 में मैट्रिक की और 1909 में इंटरमीडिएट की परीक्षा गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता भेजे गए, जहां से उन्होंने बी.ए. करने के बाद सन् 1914 में एम.ए. की परीक्षा पास की, तीन साल तक क़ानून की शिक्षा लेकर गुवाहाटी लौट आए। गुवाहाटी लौटने पर उन्होंने सोनराम हाईस्कूल में हेडमास्टर के पद का कार्यभार संभाला। यह समय राजनीतिक गुलामी का था| साम्राज्यवादी शोषण के कारण देश के अन्य भागों जैसे असम में भी ग़रीबी आमतौर पर फैली थी। लोग अशिक्षित थे, इसलिए अपनी शोषित स्थिति से अनजान थे। असम राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से पीड़ित था। ऐसे कठिन समय में असमवासियों को एक ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत थी, जो उनकी जड़ता को तोड़कर उसमें जागृति का शंख फूंक सके।
असम ही क्या पूरा देश, आज गोपीनाथ बार्दोलोई का ऋणि है। उन दिनों भारत विभाजन का तूफ़ान उठा हुआ था। तभी वह सत्ता के केंद्र बने और असम के लिए लोहपुरुष की तरह तन कर खड़े हो गए। यदि वह और उनके साथी नहीं होते, शायद कुछ हिस्से पूर्वी पाकिस्तान में चले जाते। यही नेता थे, जिन्होंने असम को टूटने से बचाया। एक बड़ा काम उन्होंने और अंजाम दिया। असम में चाय बागानों के मालिक अंग्रेज़ थे। असम को उनसे कोई लाभ नहीं था। थोड़ा-बहुत मज़दूर लोग गुज़ारा कर लेते थे । सारी आमदनी अंग्रेज़ों की थी। बाकी किसी से कोई मतलब नहीं। यह सब सादुल्ला मंत्रिमंडल की शह पर था। यह गोपीनाथ बार्दोलोई ही थे, जिन्होंने शोषण की इस भारी समस्या से लड़ने का फ़ैसला किया।
गांधीजी ने देश की आज़ादी के लिए असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया था। लोगों ने गांधी जी के आदेश के अनुसार सरकारी नौकरियां छोड़ दीं और असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े। गोपीनाथ जी भी बिना किसी हिचक के स्वतन्त्रता आन्दोलन में पूरी तरह भाग लेने लगे। पहली बार सन् 1921 में उन्होंने गांधी जी के नेतृत्व में होने वाले असहयोग आन्दोलन में भाग लिया।
सबसे पहले उन्होंने असम में दक्षिण के गोआलपाड़ा जिले का पैदल चलकर दौरा किया। इस दौरे में तरुणराम फूकन उनके साथ थे। उन्होंने जनता को गांधी जी का यह सन्देश दिया कि विदेशी माल का बहिष्कार करें और अंग्रेज़ों के काम में असहयोग करें। जनता इस बात से प्रभावित होकर विदेशी वस्तुओं की होली जलाने के बाद स्वयं चर्खे पर सूत कातकर वस्त्र धारण करने लगी। इससे अंग्रेज़ सरकार बौखला गई। गोपीनाथ जी और उनके साथियों को गिरफ्तार करके एक वर्ष की सज़ा दे दी गई। इसके बाद उन्होंने अपने आपको पूरी तरह देश के स्वतन्त्रता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया।
सन् 1926 में कांग्रेस का इकतालीसवां अधिवेशन पांडु में हुआ। गोपीनाथ ने इसमें सक्रियता से भाग लिया। इससे वह जनता में अधिक लोकप्रिय हो गए। उन्होंने पूरे राज्य की पदयात्रा करके लोगों की समस्याओं को अच्छी तरह समझा और लोक-जीवन में घुल-मिल गए। इसके कारण उनमें लोगों को संगठित करने की ज़बर्दस्त शक्ति पैदा हो गई थी। उन्होंने असम के लोगों को इकट्ठा किया और उनके मन में राष्ट्रीयता का भाव पैदा कर दिया। अपनी कार्यकुशलता, संगठन की क्षमता, व्यवहार और दूरदर्शिता द्वारा असम की जनशक्ति को जगा कर जनहित के अनुसार उसे राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का ऐतिहासिक काम किया।
सन् 1932 में वह गुवाहाटी म्युनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन चुने गए। उस समय तक असम में न तो अलग हाईकोर्ट था और न विश्वविद्यालय । गोपीनाथ जी ने कुछ देश भक्तों और असम एसोसिएशन के लोगों को साथ लेकर इस सम्बन्ध में आन्दोलन शुरू किया। सन् 1939 में जब कांग्रेस ने प्रदेश एसेम्बलियों के चुनावों में भाग लेने का निर्णय किया, तो गोपीनाथ जी कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते और सर्वसम्मति से कांग्रेस दल के नेता चुने गए।गोपीनाथ जी देश की तत्कालीन परिस्थितियों से वाक़िफ़ थे और असम की समस्याओं के अच्छे जानकार तो थे ही। उन्होंने पहचान लिया था कि असम की समस्याएं केवल असम की ही नहीं हैं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय समस्याओं का ही एक भाग है। ऐसी समस्याओं का निदान राष्ट्रीय एकता से ही सम्भव है।
सितम्बर, 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। इसमें ब्रिटिश सरकार ने भारत को उसकी इच्छा के बिना युद्ध का भागीदार बना दिया। इसलिए कांग्रेस ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में इसका विरोध किया और असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद स्थिति ने पलटा खाया और सन् 1940 में कांग्रेस ने चुनावों में हिस्सा लेने का निश्चय कर लिया।
सन् 1946 के चुनावों में असम कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और गोपीनाथ जी असम के मुख्यमन्त्री बने और उन्होंने लोगों को आज़ादी की रक्षा करने और राष्ट्र निर्माण के काम में जुट जाने का सन्देश दिया। स्वयं भी उसी के अनुकूल आचरण किया और नवनिर्माण के कार्य करने लगे ।
यह तब की बात है जब द्वितीय विश्वयुद्ध ज़ोरों पर था। उस समय अंग्रेज़ों ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में दल बनाने का प्रस्ताव रखा। इसे ‘ग्रुपिंग सिस्टम’ कहा गया। मुंबई के अगले कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस ने इस सिस्टम को स्वीकार कर लिया, जबकि गोपीनाथ जी इसके खिलाफ़ थे। आखिर वह कांग्रेस के नेताओं से मिले और उन्हें समझाया और कहा कि असम इस ग्रुप काउंसलिंग में भाग न लेकर अपना संविधान खुद बनाएगा। असम की एसेम्बली ने क्रिप्स मिशन की योजना को खारिज कर दिया। तब दस प्रतिनिधियों का ‘गणपरिशय’ बनाया गया और तय पाया गया कि चाहे संविधान बनाया जाए या कोई और काम किया जाए, फैसला ये ‘गण’ ही करेंगे। महात्मा गांधी ने इसकी अनुमति दे और इस तरह अंग्रेज़ों का कुचक्र टूट गया। यह सब गोपीनाथ बार्दोलोई के अथक प्रयत्नों से ही संभव हो पाया।
देश की आज़ादी के बाद गोपीनाथ जी असम के प्रथम मुख्यमन्त्री निर्वाचित हुए। अपने तीन वर्ष के छोटे कार्यकाल में उन्होंने आधुनिक असम की नींव रखी, जिसके आधार पर प्रदेश ने काफ़ी प्रगति की। राज्य के मानव संसाधन को बढ़ाने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा को महत्त्व दिया। राज्य में इंजीनियरिंग, चिकित्सा, आयुर्वेद, वन तथा कृषि महाविद्यालयों की स्थापना की। उच्च शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र गुवाहाटी विश्वविद्यालय की शुरुआत भी की। न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और समतावादी समाज की स्थापना के उद्देश्य से गुवाहाटी में हाईकोर्ट की स्थापना का भी श्रेय उन्हीं को जाता है ।
गोपीनाथ जी अपने व्यक्तित्व, चिन्तन और कार्य-व्यवहार से असमिया संस्कृति के प्रतिरूप बन गए। असम के महान सन्त शंकरदेव के दर्शन ने उनके चिन्तन को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साहित्य, शिक्षा, संगीत तथा संस्कृति के प्रति उनका गहरा लगाव था। वह एक अच्छे लेखक थे। उन्होंने महात्मा गांधी की ‘आत्मकथा’ एवं ‘अनासक्ति योग’ का असमिया रूपान्तरण किया था। वह बाल-साहित्य के भी रचनाकार थे। भगवान राम,ईसा मसीह, हज़रत मोहम्मद और गौतम बुद्ध जैसे देवपुरुषों की जीवन-कथाएं समान भाव से लिखी थीं। धर्मनिरपेक्षता की श्रेष्ठ परम्परा की रक्षा के लिए वह जीवन के अन्तिम क्षणों तक लड़ते रहे।
सन् 1950 में गोपीनाथ जी के निधन पर देश ने और असम ने जिस शून्यता का अहसास किया, वह राजनीति और जन-जीवन में उनके प्रभाव को स्पष्ट करता है। डॉ. राजेन्द्रप्रसाद ने अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि, “उनके निधन से असम और भारत के जन-जीवन में जो शून्यता आ गई है, उसे भरना बहुत कठिन है ”
पं. जवाहरलाल नेहरू ने उनके साहस की प्रशंसा करते हुए अपनी श्रद्धांजलि में कहा था कि, “हम सबके लिए, विशेषकर असम के लिए स्वतन्त्रता के इस वीर सेनानी का निधन बहुत बड़ी क्षति है। उन्होंने असम के उच्च पद पर मुख्यमन्त्री के रूप में राज्य की अनेक समस्याओं का साहस के साथ सामना किया था।”
आज भी असम के लोग उन्हें ‘शेरे असम’ के नाम से पुकारते हैं। भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त सन् 1999 में, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से विभूषित कर उनकी देश सेवा को आदर दिया।