किसी भी कार्य को सम्पन्न होने में वक्त लगता है विकास की प्रत्येक प्रक्रिया एक निश्चित समय लेती है। उतावला होकर, अधीर होकर कोई काम नहीं करना चाहिए। गीदड़ के जल्दबाजी के कारण कभी बेर नहीं पकते। बीज को अंकुरित होने, पेड़ के रूप में विकसित होने और फिर उसमें फल लगने में वक्त लगता है। बीज एक दिन में पेड़ नहीं हो सकता है।
दानः यह एक अच्छे कारण के लिए या जरूरतमंद व्यक्तियों को अपनी संपत्ति को देने के लिए संदर्भित करता है। सच्चा दान वह है जो श्रेष्ठता की भावना के साथ नहीं किया जाता है। बल्कि मदद करने के अवसर के लिए भगवान के प्रति कृतज्ञता की भावना के साथ किया जाता है। शरीर के कल्याण के लिए किया गया भौतिक दान अस्थायी रूप से दूसरों की मदद करता है। आत्मा के मंच पर किया गया आध्यात्मिक दान, सभी दुखों के कारण को खत्म करने में मदद करता है, जो कि ईश्वर से अलगाव है। नतीजतन, इसे भौतिक दान से अधिक माना जाता है।
किसी भी वस्तु का दान करते रहने से विचार और मन में खुलापन आता है। आसक्ति (मोह) कमजोर पड़ती है, जो शरीर छूटने या मुक्त होने में जरूरी भूमिका निभाती है। हर तरह के लगाव और भाव को छोड़ने की शुरुआत दान और क्षमा से ही होती है। दानशील व्यक्ति से किसी भी प्रकार का रोग या शोक भी नहीं चिपकता है। बुढ़ापे में मृत्यु सरल हो, वैराग्य हो इसका यह श्रेष्ठ उपाय है और इसे पुण्य भी माना गया है। दान देना एक पुण्य कर्म है। माना जाता है कि दान करने से मनुष्य का इस लोक के बाद परलोक में भी कल्याण होता है। दान देने से मनुष्य को सद्गति मिलती है।
दान करने से जीवन की तमाम परेशानियों का अंत खुद-ब-खुद होने लगता है। दान करने से कर्म सुधरते हैं और अगर कर्म सुधर जाएं तो भाग्य संवरते देर नहीं लगती है। हमारे शास्त्रें में ऋषि दधीचि का वर्णन है जिन्होंने अपनी हड्डियां तक दान में दे दी थीं। कर्ण का वर्णन है जिसने अपने अंतिम समय में भी अपना स्वर्ण दंत याचक को दान दे दिया था। दान एक हाथ से देने पर अनेक हाथों से लौटकर हमारे ही पास वापस आता। बस, शर्त यह है कि दान निःस्वार्थ भाव से श्रद्धापूर्वक समाज की भलाई के लिए किया जाए। दान करने से सभी तरह के दैहिक, मानसिक और आत्मिक ताप मिट जाते हैं। दान करने से ग्रहदोष, नक्षत्रदोष, पितृदोष, मंगलदोष, कालसर्पदोष आदि सभी तरह के दोष मिट जाते हैं। जरूरतमंद व्यक्ति को दान देने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। दान करने से घर परिवार में किसी भी प्रकार का संकट नहीं आता है और सुख समृद्धि बनी रहती है।
भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही दान करने की परंपरा चली आ रही है। हिंदू सनातन धर्म में पांच प्रकार के दानों का वर्णन किया गया है। ये पांच दान हैं, विद्या, भूमि, कन्या, गौ और अन्न दान। इन पांचों दानों का बहुत महत्व माना जाता है। लेकिन दान करते समय ध्यान रखें कि किसी भी प्रकार का दान निस्वार्थ भाव से किया जाना चाहिए। वह तभी फलीभूत होता है। तो चलिए जानते हैं इन पांचो दानों का महत्व- भूमि दान – पहले के समय में राजाओं द्वारा योग्य और श्रेष्ठ लोगों को भूमि दान किया जाता था। भगवान विष्णु ने बटुक ब्राह्मण का अवतार लेकर तीन पग में ही तीनों लोक नाप लिए थे। यदि सही प्रकार से इस दान को किया जाए तो इसका बहुत महत्व होता है। यदि आश्रम, विद्यालय, भवन, धर्मशाला, प्याउ, गौशाला निर्माण आदि के लिए भूमि दान किया जाए तो श्रेष्ठ रहता है।
गौदान – सनातन संस्कृति में गौ दान को विशेष महत्व माना जाता है। इस दान के संबंध में कहा जाता है कि जो व्यक्ति गौदान करता है, इस लोक को बाद परलोक में भी उसका कल्याण होता है। दान करने वाले व्यक्ति और उसके पूर्वजों को जन्म मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है।
अन्न दान – अन्न दान करना बहुत ही पुण्य का कार्य होता है। यह एक ऐसा दान है, जिसके द्वारा व्यक्ति भूखे को तृप्त कराता है। यह दान भोजन की महत्वता को दर्शाता है। सभी प्रकार की सात्विक खाद्य सामाग्रियां इसमें समाहित हैं।
कन्या दान – कन्या दान को महादान कहा जाता है। सनातन धर्म में कन्या दान को सर्वाेत्तम माना गया है। यह दान कन्या के माता-पिता द्वारा उसके पाणिग्रहण संस्कार पर किया जाता है। इस दान में माता-पिता अपनी पुत्री का हाथ वर के हाथ में रखते हुए संकल्प लेते हैं और उसकी समस्त जिम्मेदारियां वर को सौंप देते हैं।
विद्या दान – विद्या धन का दान गुरु वरिष्ठ सलाहकार योग्य द्वारा प्रदान किया जाता है। इस दान से मनुष्य में विद्या, विनय और विवेकशीलता के गुण आते हैं। जिससे समाज और विश्व का कल्याण होता है। भारतीय संस्कृति में सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा में विद्या दान चला आ रहा है। विद्या एक ऐसा धन है जो बांटने से और भी बढ़ता है।
इंद्रियों पर नियंत्रणः इन्द्रियाँ मन को भौतिक भ्रम में गहराई तक खींचने की क्षमता के लिए कुख्यात हैं। वे तत्काल संतुष्टि पाने के लिए जीवों को लुभाते हैं। हालाँकि, सद्गुण के मार्ग पर चलने के लिए उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निम्न कामुक सुखों को त्यागने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, ईश्वर के मार्ग पर चलने के लिए इंद्रियों का संयम एक आवश्यक गुण है।
संसार के समस्त जीव में मानव की श्रेष्ठता है और ईश्वर की अनुकम्पा से मानव की इन्द्रियों के नियंत्रण में – मन की भूमिका सर्वाेपरी है। सामान्यतः मन का अर्थ है प्राणियों की वह शक्ति जिसके द्वारा विचार, अपना-पराया, सुख-दुख और संकल्प की अनुभूति होती है। विद्वानों ने मन को भिन्न-भिन्न ढंग से व्याख्यायित किया है। चंचलता और स्वच्छंदता मन की नैसर्गिक विशेषता है। इसके कारण दार्शनिकों का मानना है कि मानव-मन उस जलाशय की भांति है जिसका स्थिर जल हवा के प्रभाव से लहरों में परिवर्तित होकर शीघ्र गतिमान हो जाता है। वहीं मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मानव-मन में सबसे पहले विचार आता है और फिर उस पर मंथन होता है और उसके बाद उस पर क्रियान्वयन-प्रक्रिया आरंभ होती है।
विचार ही व्यक्ति के उत्थान और पतन का आधार होते हैं। मन परिवेश से शीघ्र प्रभावित होकर कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेंद्रियों पर आधिपत्य स्थापित कर लेता है। वस्तुतः मन इंद्रियों का एक समूहमात्र है। इसलिए अनुभवी संतों द्वारा मन को ग्यारहवीं इंद्रिय माना जाता है। मन ही मनुष्य की वह शक्ति है, जिसके द्वारा वह नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है। यानी मन में उठने वाले विचार यदि सात्विक होंगे तो मनुष्य उन्नति के शिखर पर पहुंच सकता है। लेकिन असात्विक चिंतन उसे पतन के गर्त में पहुंचा देता है। क्योंकि मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति मनोनुकूल कार्याे के प्रति संबंधित इंद्रिय को शीघ्र ही प्रभावित कर लेने की होती है।
यदि मनुष्य अपने मन को नियंत्रित कर लेता है, तो उसका सभी इंद्रियों पर नियंत्रण हो जाएगा। कहा भी जाता है, ‘मन जीता तो जग जीता।’ शास्त्रकारों और संतों ने मन के नियंत्रण और परिष्कार के लिए अनेक उपाय बताए हैं। ‘यजुर्वेद’ में कहा गया है-‘मेरा मन शिवसंकल्प परायण हो और अच्छे विचारों को धारण करने वाला हो।’ ऐसी उदात्त वैचारिक दृढ़ संकल्पशक्ति को अंतःकरण में धारण करना होगा। अनुभवी संतों के अनुसार मन को नियंत्रण में बनाए रखने के लिए पंचविकारों-काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह से बचा कर सद्गुणों का समावेश करना परमावश्यक है और इसके माध्यम से से ही स्वीकृति मन के परिष्कार के लिए इंद्रिय संयम, संतों का सानिध्य, सत्संग और विवेक आदि की प्राप्ति हरि-कृपा के बगैर संभव नहीं है।