अनेक मुश्केलियो से उभरकर दुनिया में नाम कमाने वाले उद्योगपति… एप्पल कम्पनी के संस्थापक, स्टीव जॉब्स

स्टीव जॉब्स का पूरा नाम स्टीवन पॉल जॉब्स है| जॉब्स एक अमेरिकी बिजनेस टाईकून और अविष्कारक थे| वे एप्पल इंक  के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे|जॉब्स पिक्सर एनिमेशन स्टूडियोज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी रहे| वे दि वाल्ट डिज्नी कंपनी के निदेशक मंडल के सदस्य भी रहे| उनके कार्यकाल में डिज्नी ने पिक्सर का अधिग्रहण कर लिया था| 1995 में आयी फिल्म टॉय स्टोरी  में उन्होंने बतौर कार्यकारी निर्माता काम किया|

कप्यूटर,लैपटॉप और मोबाइल बनाने वाली कंपनी एप्पल के भूतपूर्व सीईओ और जाने-माने अमेरिकी उद्योगपति स्टीव जॉब्स ने यह मुकाम हासिल किया| इनका जन्म 24 फरवरी 1955 को संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया प्रान्त में  सैन फ्रांसिस्को शहर में हुआ| उनका जीवन जन्म से ही संघर्षपूर्ण  था| उनकी माँ अविवाहित कॉलेज छात्रा थी| इसी कारण वे उन्हें  रखना नहीं चाहती थी| कैलीफोर्निया में रहनेवाले पॉल और कालरा जॉब्स ने स्टीव को गोद लिया था|  वे  मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे और ज्यादा पढेलिखे  भी नहीं थे|

1973 में जॉब्स तकनीशियन के रूप में कार्य करते थे| 1974 में आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में वे भारत आये थे | उन्होंने  काफी समय दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हिमाचल  प्रदेश में बिताया|

जॉब्स 1976 में एप्पल के सह संस्थापक थे और एप्पल के पर्सनल कंप्यूटर बेचने लगे| एप्पल तेजी से आगे बढती गयी और पैसे कमाती गयी| पहले साल के अंत तक पर्सनल कंप्यूटर बनाने वाली दूसरी कंपनी बन गयी|  एप्पल बड़ी मात्रा  में पर्सनल कंप्यूटर उत्पादन करनेवाली सबसे बड़ी कंपनी बनी|

जब स्टीव 15 वर्ष के हुए तब उनके पिता ने उन्हें उपहार स्वरुप एक सेकंडहैण्ड कार दी थी| स्टीव ने इसे नया इंजन लगाकर कामचलाऊ बनाया था|स्टीव जॉब्स को स्कूल के दिनों में मैरिजूआना  की लत पड़ी थी जो एक नशीला पदार्थ होता है | इसके बारे में जब पिता को मालूम हुआ, तब उन्होंने स्टीव को  बहुत डांटा और भविष्य में कभी नशीला पदार्थ न लेने का वादा करवाया| स्टीव ने पिता जी को दिया हुआ वादा आजीवन निभाया और कभी भी नशीली चीजों  को हाथ नहीं लगाया| स्टीव जॉब्स को तैराकी में भी रूचि थी| वे स्कूल की  तैराकी टीम  का हिस्सा भी थे| तैराकी टीम में ही उनकी मुलाकात स्टीव वोजनियाक से हुई जिनकी  इलेक्ट्रानिक्स में भी रूचि थी|

स्टीव जॉब्स की रूचि इलेक्ट्रानिक्स में ज्यादा थी| लेकिन रीड कालेज में पढ़ाई करते हुए उनका ध्यान अध्यात्म की ओर बढ़ गया| बाबा रामदास की पुस्तक “ Be Here Now”  ने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया | इसी कालेज में उनकी मुलाकात डेनियल कोटक से हुई थी| अध्यात्म के संपर्क में आते ही  स्टीव शाकाहारी बन गए थे | उनके मित्र कोटक को भी उन्होंने शाकाहारी बना दिया था| अध्यात्म में बढ़ती रूचि के कारण उन्होंने कृष्ण मंदिर में जाना शुरू कर दिया था| यह स्टीव जॉब्स के जीवन का परिवर्तन का दौर था|

मात्र बीस वर्ष की उम्र में सन 1976 में उन्होंने एप्पल कंपनी की शुरुयात की|स्टीव ने अपने स्कूल के सहपाठी मित्र वोजनियाक के साथ मिलकर अपने  पिता के गैरेज में  ऑपरेटिंग  सिस्टम मेकिनटोश तैयार किया और इसे बेचने के लिए एप्पल कंप्यूटर का निर्माण करना चाहते थे| लेकिन पैसों की कमी के कारण समस्या आ रही थी| उनकी ये समस्या उनके एक मित्र मर्कुल्ला ने दूर किया| वेन  केवल एक सहायक बने, बल्कि साझेदार भी बन गए| इस प्रकार एप्पल कंप्यूटर बनाने का काम शुरू हुआ|

लेकिन उनकी यह उपलब्धि अधिक दिन तक नहीं टिकी| साझेदारों की नापसंदगी और आपस में कहासुनी से कंपनी की लोकप्रियता कम होने लगी| धीरे धीरे कंपनी भी कर्ज  में डूब गयी| बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर की मीटिंग में सारे दोष स्टीव पर आ  गए| उनको कंपनी ने  बाहर का रास्ता दिखा दिया| स्टीव के जीवन में यह सबसे दुखद पल था|

पेप्सिको के पूर्व प्रेसिडेंट जान स्कूली कहते हैं कि जब मैं एकबार उनके घर गया तब मैंने देखा कि उनके घर में एक भी फर्निचर नहीं था| उनके जीवन में एकबार ऐसा भी वक्त आया जब उन्हें जमीन पर सोने केलिए मजबूर होना पड़ा| हर रविवार को हरेकृष्ण मंदिर में लंगर लगता था| वे खाने के लिए सात किलोमीटर पैदल चलकर जाते थे| उनका कहना है कि असफ़लत़ा और ख़राब हालत में इन्सान को परेशान होने की जरुरत नहीं है| वे कहते  है  कि यह निश्चय  करना कि आपको क्या नहीं करना है उतना ही  महत्त्वपूर्ण है जितना कि यह निश्चय करना कि आपको क्या करना है| उनके अनुसार इस बात को याद रखना कि मैं बहुत जल्द मर जाउंगा मुझे अपनी जिंदगी के बड़े निर्णय लेने में सबसे ज्यादा मददगार होताहै| जब एकबार मौत के बारे में सोचता हूँ सारा उम्मीद, सारा गर्व, असफल होने का डर  सबकुछ गायब हो जाता है,  सिर्फ  वही बचता है जो वाकई जरुरी है|

स्टीव को सन 2003 से पेनक्रियेटिव  नाम की कैंसर की बिमारी हो गयी थी| फिर भी वे रोज कंपनी में जाते थे| कैंसर की बिमारी के कारण 5 अक्तूबर 2011 को पालो आल्टो कैलिफोर्निया में उनका निधन हुआ| लेकिन गर्व की बात यह है की, आज उनकी बनाई यह “एप्पल” कम्पनी दुनीया मे बहोत लोपप्रिय है|

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